कृष्ण

क्या रामायण और महाभारत वास्तविक है?

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क्या रामायण और महाभारत वास्तविक है?

यह प्रश्न मेरे ब्लॉग एवं Quora के प्रबुध्द पाठक द्वारा पूछा गया है 

यह एक गंभीर और व्यापक समस्या है इन दिनों, इस देश की आधी से ज्यादा आबादी अपनी वास्तविकता से ही इनकार कर रही है, १२०० वर्षों की गुलामी और पिछले ७० वर्षों से कांग्रेस और वामपंथी लेखकों और विचारकों ने इतना विरूपण किया है, हमारी सभ्यता और संस्कृति का लोग अपमान करने लगे हैं और अपने आप पर ही संदेह करने लगे है।

इससे ज्यादा पतन इस देश के लोगो का क्या हो सकता है, राम और कृष्ण, बुद्ध और महावीर, और इन सभी परम आत्माओं के सम्बन्ध मे वास्तविक सभी सत्य इन सब इन लोगो के लिए कल्पित कथाएं है और इन स्वनामधन्य मूर्ख शिरोमणियों  द्वारा प्रतिपादित हर किस्म की मुर्खता और घटिया थ्योरी सही है। किसी भी देश और संस्कृति का कितना नैतिक और आध्यात्मिक पतन गलत विचारधारा और गलत राजनितिक और सामाजिक प्रभाव से हो सकता है यह इस बात का जीवंत उदाहरण है।

दीपज्योती

जिस भारत वर्ष की आर्थिक समृद्धि, कला और विज्ञान, जीवन सम्बन्धी और आध्यात्मिक समृद्धि , यहाँ की  सुसंस्कृति विश्व के सभी हिस्सों के लोगो को विभिन्न कारणों से आकर्षित करती रही है पिछले हजारों सालों से उस भारतवर्ष के परम पुरुष एक काल्पनिक चरित्र और कपोल कल्पना है, इससे हास्यापद बात क्या हो सकती है

मुझे इन बददिमाग और क्षुद्र बुद्धि लोगो पर दया आती है और इनकी विचारधारा के लिए नफरत और सख्त अफ़सोस। मै इन घटिया और दुर्बुद्धि लोगो को इसका अधिकार नहीं दे सकता और हर संभव तरीके से इनका बहिस्कार और निर्मूलन करना अपना परम धर्म समझता हूँ

इतना अपदूषण हमारी विचारधारा और मानसिकता का हो गया है की हम अपने ही गौरव के परम शिखरों को कपोल कल्पित कथाएं कह रहे हैं, आज १२०० साल की गुलामी और दुर्दांत हमलावरो की हर किस्म की साजिश और अमानवीय करतूतों के बावजूद इस देश की ८०% आबादी हिन्दू है, इसका सारा श्रेय इस महान देश की गौरवमयी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को जाता है।

इसके साथ ही यह विषाक्त मानसिकता इस देश की संस्कृति और इसकी बहुमूल्य आध्यात्मिक विरासत को नष्ट कर हमलावरों की संस्कृति और दूषित विचारधारा को स्थापित करने का भयानक षड़यंत्र इस महान देश की धरती पर यहाँ के भ्रष्ट, आत्महीन और दुष्ट लोगो के द्वारा पिछले १००० वर्षों से किया जा रहा है

और इसमें वृद्धि करने और इसे इसके निम्नतम स्तर पे ले जाने का काम स्वतन्त्रता के बाद से इस देश पर शासन करनेवाले राजनितिक दलों और उनकी विषाक्त और कुत्सित षड्यंत्रकारी नीतियों ने इस देश मे अपसंस्कृति को बढ़ावा देने और यहाँ की मूल संस्कृति और निवासियों को अपमानित और लांक्षित करने का हर संभव प्रयास किया गया है, देश के अंदर और देश के बाहर अंतररास्ट्रीय समुदाय मे भी, लेकिन वो इसमें सफल नहीं हो सके क्यूंकि अभी इस धरती पे इस धरती के गौरव के लिए प्राण देने वाले वीरों और माँ भारती के सच्चे सपूतों की कोई भी कमी नहीं है।

मंदिर

राम और कृष्ण और हमारे तमाम आध्यात्मिक शिक्षक हमारी महान विरासत के निर्माता और प्रदाता है, हमे इस पर गर्व है। वो हमारे परम चेतना के परम शिखर है, उनका अस्वीकार स्वयं की अस्वीकृति है।

हमारी संस्कृति मे इतिहास लिखने की परंपरा नहीं रही, जैसा पश्चिम और दुसरे मुल्को और सभ्यताओं मे रहा है, यहाँ की सांस्कृतिक ऊर्जा और और गाथा यहाँ के कण कण मे आविष्ट है, उसे किसी भी प्रमाण और सत्यापन की जरुरत नहीं है।

यहाँ सत्य के खोजी हुए हैं और वो जानते रहे है की सत्य कभी नष्ट नहीं होता, और जो सत्य के खोजी है वो इसे खोज और पुनः अविष्कृत कर सकते है। मूढ़ अनर्गल बातें करते रहे हैं, और महा मूढ़ उनपे यकीन करते रहे हैं , उनका कुछ नहीं किया जा सकता। सत्य स्वयम अपना साक्ष्य है। इस देश का गौरव और इसकी महान संस्कृति को कितने भी षडयन्त्रों और हमलों से नष्ट नहीं किया जा सकता।

जिन लोगो के लिए रामायण और महाभारत काल्पनिक ग्रन्थ है, उन्हें मानसिक इलाज की आवश्यकता है, जो इस पुण्य सलिला धरती के बिखरे कण कण मे व्याप्त हैं, हमारे रोम रोम मे जो बसे हैं, जिनका रक्त हमारी शिराओं मे बह रहा उन्हें अस्वीकार कर दे, इससे ज्यादा मूढ़ता पूर्ण बात और सुझाव क्या हो सकता है।

ऐसे लोग इन इन महान गाथाओं के स्मृति चिन्हों को देखने समझने और स्वीकार करने मे असक्षम और असहमत है, परम दुर्भाग्य इन लोगों का, यह अपने अस्तित्व और अर्थवत्ता से इनकार कर रहे यह बेहद हास्यापद है और दुखद भी।

अंत मे इतना ही कहना चाहता हूँ उन सभी लोगो से जिनके लिए यह कपोल कल्पना है वो अपने भ्रम के साथ जिए और जो इन मे आस्था रखते हैं उन्हें इस बात के साथ प्रेमपूर्वक जिए और ऐसे तमाम लोगों के मुंह पर और उनकी निर्लज्जता और छद्म विचारधारा को नष्ट करने के लिए हर संभव प्रयास करे, उनका सामजिक बहिष्कार करें और उनका वीभत्स और विद्रूप चेहरा सारी दुनिया के सामने उजागर करें यही हमारे परम पुरुषों और उनके द्वारा निर्मित इस अद्भुत विरास्सत के प्रति हमारी आदरांजलि होगी

आपको अधिकार है की आप अपनी मूढ़ता के चश्मे से परमसत्य की अनदेखी करते रहे, पूरे विश्व मे अरबिया से लेकर इंडोनेशिया तक ५००० से ६००० पूर्व तक की भारतीय सभ्यता और पौराणिक सत्यों के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। हजारों लाखों मूर्तियाँ और मंदिर विश्व के कोने कोने से इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को प्राप्त हो रहे है और कुछ मूर्खाधिराज इसे कल्पना बता रहे हैं, अभी विदेशी वैज्ञानिकों  ने रामसेतु की सत्यता का सत्यापन किया है, लेकिन जिन्हें देखना समझना नहीं है उनके लिए कोई भी बात स्वीकार्य नहीं है। 

फिर भी कुछ पूर्वाग्रही और दूषित मानसिकता के लोग इसका इनकार करना चाहते है तो वो स्वतंत्र है इस मूढ़ता के लिए लेकिन इससे इस परम महत्वपूर्ण पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहर और अलिखित इतिहास और सत्य को कोई भी हानि नहीं पहुंचा सकंगे, धन्यवाद।

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