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क्या हमारे घरों में बहू और बेटी को सामान समझा जाता है?

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क्या हमारे घरों में बेटी और बहू को समान समझा जाता है?

हमारे घर में हमारी प्यारी बहन को बहुत प्यार और अच्छी शिक्षा दी गई और वो जिस घर में गई उसे बेहद प्यार और सम्मान मिला है, वो बेहद समझदार, मेहनती और कुशल बेटी, पत्नी, गृहणी, और मां है।

हमारी मां ने उसे और हम सभी को सभी बातों और काम की बेहतर शिक्षा दी और हमारी मां और बहन दोनों सुपर वुमन है, मैंने उनकी तरह काम करते बहुत कम महिलाओं को देखा है।

हम लोगो को उनके हाथ से काम छीनना पड़ता है और कहना पड़ता है बस करो मेरी मां, गजब की ऊर्जा और लगन है उनमें, दुर्भाग्य से हमारे घर में किसी और की बेटी नहीं आयी, क्यूंकि हम से किसी भी भाई ने अभी तक शादी नहीं की, इसलिए यह सौभाग्य हमें नहीं मिला।

लेकिन मेरी बहुत सारी और मुंहबोली बहने और बेटियां है, जो दूसरे घरों में गई है और उनके साथ बेहद सौतेला व्यवहार होता है, उन सभी घरों में उस घर की बेटियों को हर किस्म की आज़ादी और छूट है लेकिन बहुओं को बहुत अशोभनीय और अमानवीय स्थितियों से गुजरना पड़ता है, जिससे हृदय तार तार हो जाता है, यह भारतीय परिवार व्यवस्था का सबसे घिनौना और अशोभनीय पहलू है।

यह दोगला व्यवहार जो हमारे घरों में उन बेटियों के साथ किया जाता है जो अपना घर परिवार और सब कुछ छोड़ कर हमारा घर संसार बसाने आती हैं।

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वो औरतें जो खुद दूसरों के घर कभी बहू बन कर गई थी किसी और कि बेटी के साथ इतना अमानवीय और घिनौना व्यवहार करती है, बेहद कुरूप और शर्मनाक बात है, स्त्रियां, स्त्रियों की सबसे बड़ी शत्रु है इस समाज और हमारे परिवारों में, और इन्ही बीमार और रुग्ण स्त्रियों की शह पर पुरुष भी उनपर अत्याचार और उनका हर संभव शोषण करते हैं।

यह बात मुझे बेहद दुख देती है, मुझसे जुड़ी कोई भी बहन-बेटी नहीं जो कम या ज्यादा इस त्रास का और अन्याय का शिकार नहीं है, मुझे बेहद घुटन और तकलीफ होती है यह सब देखकर, जानकर, क्यों हमारे अधिकांश परिवार इन सभी बेटियों के लिए नर्क और यातनाघर है।

मैंने गुणी से गुणी और काबिल से काबिल स्त्रियों को अपने ससुराल में अपने पति और सास, और बाकी लोगों से प्रताड़ित होते और अत्याचार सहते देखा है और वो खामोशी, पीड़ा और मज़बूरी में दोनों परिवारों के सम्मान और खुशहाली के लिए सब कुछ बर्दाश्त करते रहती है उम्र भर।

और जब इन्हें सास बनने का मौका मिलता है तो यह अपनी सारी भड़ास, कुंठा और बदला उन पराई बेटियों से निकलती है जो इनके घर आती है, यह बात मेरे समझ से परे है कि जिस इंसान ने खुद दूसरों के अत्याचार और नीचता को झेला है वो किसी और मासूम के प्रति इतनी निर्दयी और नीच कैसे हो जाती है।

अपना पूरा जीवन दूसरों की खातिर खपाने वाली, अपनी हर खुशी और सपने को दूसरों के लिए कुर्बान करनेवाली हमारी बहन बेटियों के साथ दूसरी स्त्रियां और वो पुरुष जो खुद बहन बेटी वाले है कैसे इतने नीच और कुरूप व्यवहार कर सकते हैं, मेरी समझ के बाहर है, पारिवारिक जीवन और विवाह से वितृष्णा कि एक गहरी वजह यह भी है।

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मेरी नज़र में इस देश में विवाह और परिवार सबसे कुरूप और बीमार संस्थाएं है जिनकी आत्मा और पवित्रता नष्ट हो गई है।

इस धरती पर होने वाले घरेलू और बाहर समाज में घटित होनेवाले समस्त अपराधों , हिंसा, और व्यभिचार की जड़ में इन्ही रुग्ण, शोषण आधारित विवाह और परिवार व्यवस्था का हाथ है।

इस धरती पर सारे शुभ और अशुभ कि जड़ में विवाह और परिवार व्यवस्था है जो अपनी पवित्रता, अर्थ और गरिमा खो चुके है, अब वो शोषण, व्यापार और संगठित अपराध की जननी हो गए हैं।

इंसान को सारे सद्गुणों और अवगुणों कि प्रारंभिक शिक्षा और आधार अपने घर परिवार से ही मिलता है, सांस्कृतिक और सामाजिक अपदूषण और हमारे शाश्वत मूल्यों से विहीन विवाह और परिवार सिर्फ तनाव, शोषण, विघटन और समस्त अपराधों की जननी, पोषक और आधार बन गए हैं, यह सत्य है 90% लोगो के संबंध में।

मैं इन सब बातों का गहरा भोक्ता, साक्षी और अनुसंधानकर्ता रहा हूं, और यह सूरत बदलनेवाली नहीं जब तक हमारे यहां विवाह का आधार प्रेम और परिवार का आधार सबके लिए समान व्यवहार और सुरक्षा ना हो जाए, तब तक हमारी बेटियां लूटी, पीटे जाने और समस्त दुर्व्यवहार और हर संभव अत्याचार से मुक्त नहीं हो सकेगी, और हर बेटी अपने ससूराल में अपने घर जैसा प्रेम, आदर और स्वतंत्रता पा सकेगी।

यह सब बातें मेरे हृदय के बेहद करीब है और मेरी आत्मा अपने से जुड़ी और अपरिचित, हर बहन बेटी के दर्द से बेहद तकलीफ पाती है अपनी सीमा में मैं हर संभव उपाय उन्हें शिक्षित करने, स्वस्थ रहने और इन सभी बातों का सामना करने के तैयार करने के लिए करता हूं।

जब तक हमारे घरों में बहन बेटियां चाहे वो हमारे घर की हो या दूसरे घरों से आती हो प्रेम और सद्भावना के साथ, सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मान पूर्वक जीवन ना जी रही हो, घरों में समाज में और दुनिया में कभी सुख शांति और धर्म कि स्थापना नहीं हो सकेगी।

सब कुछ हमारे घर से शुरू होता है और सभी के घरों का निर्माण और आधार दूसरे घरों से आती बेटियां बनाती है, हर घर उनकी दया, प्रेम, करुणा और कुशलता और त्याग का मोहताज है यदि वो पीड़ित, कुंठित और शोषित रहेंगी तो वो हर घर, समाज और राष्ट्र दुख, आतंक, अपराध और हर किस्म की दुख़दायी और विनाशकारी बातों से ग्रस्त रहेगा।

हम सबको मिलकर इस दूषित और रुग्ण व्यवस्था को बदलना पड़ेगा ताकि किसी बेटी को विवाह और ससुराल आतंकित ना करे और कोई बहन और बेटी ससुराल में आकर अपने मायके की याद करके ना रोए।

धन्यवाद

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