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क्या भारतीय संस्कृति सेक्स विरोधी है?

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क्या भारतीय संस्कृति सेक्स विरोधी है?

क्या भारतीय संस्कृति सेक्स विरोधी है? वर्तमान समय में हमारे समाज में प्रचलित बहुत सारी मान्यताएं और विचार मूलतः हमारी संस्कृति का अंग कभी नहीं रहे है, यह सब पिछले 1000 साल की गुलामी से उपजे सांस्कृतिक अपदूषण, अवमूल्यन का परिणाम है।

सेक्स का दमन या विरोध कभी भी हमारी संस्कृति और जीवन शैली का हिस्सा नहीं रहे है, यहां रूपांतरण और विकास पर जोर है दमन और प्रतिबंध पर नहीं, पिछले 75 साल मे इस देश की आबादी 30 करोड़ से 130 करोड़ हो गयी यह इस बात का सबूत है की हमारी संस्कृति सेक्स विरोधी नहीं है और हमारे देश के नागरिक मन प्राण से इसमें संलग्न है।

इस देश ने खजुराहो के मंदिर और कामसूत्र की रचना की है, यह देश और संस्कृति निर्ग्रन्थ और विकृति रहित मनुष्य के विकास और निर्माण के पक्षधर रहे है सदा से, यहां बेहद स्वस्थ और सुसंस्कृत विचार सेक्स के संबंध में था, है, और रहेगा।

हमारी संस्कृति ने काम को जीवन के 4 परम पुरुषार्थ में से एक रखा है, हमारी संस्कृति ऊर्जा के रूपांतरण की हामी रही है दमन की नहीं।

दूसरी बात हमारी संस्कृति का अपदूषण और अवमूल्यन और विदेशीकरण और कुप्रचार के कारण ऐसी बातें या धारणा इस संबंध में प्रचलित है। यहां प्रेम और श्रृंगार की अद्भुत रचनाएं की गई है, जीवन के सभी आयामो की प्रतिष्ठा है यहां, पलायन या दमन नहीं।

यह देश किसी भी प्राकृतिक और स्वस्थ बात के विरोध में कभी नहीं रहा है, बल्कि इसने उस संबंध में श्रेष्ठतम खोज और ज्ञान विज्ञान सारे विश्व को दिया है ताकि सभी उसकी वास्तविकता और अर्थवत्ता समझकर उसका उचित और कल्याणकारी उपयोग कर सके, और सेक्स के संबंध में सारी दुनिया ने सीखा और जाना है इस संस्कृति से, आज भी वात्स्यायन द्वारा रचित कामसूत्र एक अनूठा और अद्वितीय ग्रंथ है, पूरे विश्व में इसका कोई सानी नहीं है।

हमारे अनेक बेहद प्रतिष्ठित और विश्व विख्यात मंदिरों में काम और रतिक्रीडा का बेहद कलात्मक चित्रण और नयनाभिराम चित्रण है जो विश्व में कहीं और उपलब्ध नहीं है।

यहां काम का आध्यात्मिक चित्रण और अंगीकार है, यह सिर्फ पशुप्रवृत्ती का अनुकरण नहीं है, काम के स्वस्थ और कल्याणकारी उपयोग और अंगीकार द्वारा राम (अपने परम स्वरूप) को उपलब्ध करना हमारी जीवन यात्रा और खोज का प्रथम और अंतिम लक्ष्य है।

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एक समस्या यह है आज़ादी के बाद से खास तौर से पिछले 50 वर्षों में विवाह संस्थाओं और परिवार संस्था के स्वरूप में बदलाव आया है, हमारे देश मे वर्तमान समाज यह तय नहीं कर पा रहा है की, वो किस तरह से युवाओं को इस सम्बन्ध मे जागरूक और व्यवस्थित कर सके, ताकि वो इस सम्बन्ध मे भ्रमित, कुंठित और पथभ्रष्ट न हो।

युवक युवतियों की उम्र शिक्षा और रोजगार की संभावनाएं तलाशने के कारण उन्हें अधिक उम्र तक अविवाहित रहना पड़ रहा है, और उनके बीच अंतरंगता बढ़ रही है, वो थोड़े भ्रमित हैं और असमंजस में है, और अनजाने में पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण कर दुख उठा रहे है, हमारी संस्कृति मे सिर्फ शारीरक आकर्षण और लैंगिक उत्तेजना और उसकी तृप्ति को सब कुछ नहीं मान है, हम मनुष्य है, पशु नहीं, यही समझ और चेतना हमे पशुओं से भिन्न और श्रेष्ठ होकर मनुष्य होने में सहायक होती है।
हमे इस संबंध में अपनी सोच और समझ को बेहतर करने की जरूरत है, और हमारे युवा बच्चों को इस संबंध में उचित विचार और समझ देने की जरूरत है ताकि वो अपनी उम्र के इस पड़ाव में इस प्रबल और प्राकृतिक शारीरिक अर्ज और ऊर्जा को सही तरीके से समझ और सम्हाल सके, और स्वयं को और दूसरों को शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से अनचाही बातों और स्थितियों में ना डालें।

हमारी संस्कृति में सेक्स दुनिया के अन्य संस्कृतियों की तरह उच्चश्रंखल और मनमाने तरीके से प्रचलित नहीं है, वो सिर्फ शारीरिक बात नहीं है, उसका आध्यात्मिक और भावनात्मक पक्ष भी है, जो इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इसमें उतरने की सीख और सुझाव से भरा है।

अतः यह कहना कि हमारी संस्कृति सेक्स का दमन सिखाती है दुर्भाग्यपूर्ण और बिल्कुल ग़लत आरोप है, हमारी संस्कृति जीवन विधायक है और जीवन की इस प्रबल और जीवन की आधारभूत ऊर्जा के कल्याणकारी नियोजन की व्यवस्था और विज्ञान प्रस्तुत करती है। हमारी संस्कृति मे सेक्स कभी भी निंदनीय या गर्हित नहीं रहा है, उसके उचित उपयोग की धारणा और पूर्ण सहज स्वीकार रहा है।

सेक्स संपूर्ण जीवन नहीं जीवन का एक छोटा सा हिस्सा है, इसके प्रति उचित समझ और स्वीकार ही हमें इसके सर्वोत्तम और कल्याणकारी उपयोग मे समर्थ बना सकता है, वर्ना यह व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए सबसे विकट समस्या बन सकता है, बना हुआ है, और बना रहेगा।

बिना हमारी संस्कृति और इसकी जीवन के सभी आयामों के प्रति समझ और व्यवहार और इसके वास्तविक वैज्ञानिक प्रयोजन को समझे और जाने संकुचित एवम् पूर्वाग्रही दृष्टिकोण रखना, और ऐसी मूढ़तापुर्ण धारणा रखना और उसे प्रचारित करना सर्वथा दोषपूर्ण और गलत बात है।

धन्यवाद।

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