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क्या आपको लगता है कि हम सभी आध्यात्मिक या मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं?

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क्या आपको लगता है कि हम सभी आध्यात्मिक या मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं?

यह प्रश्न मेरे ब्लॉग एवं Quora के प्रबुध्द पाठक द्वारा पूछा गया है 

इस पूरे ब्रम्हांड का एक एक परमाणु आपस मे जुडा है, सम्बद्ध है। चाहे इसके बारे मे कोई समझ या प्रतीति हमे हो या नहीं। एक छोटा सा प्रयोग करके देखिये आप अपने आसपास किसी भी प्रसन्न और मुस्कुराते व्यक्ति, या बच्चे को देखिये, आपके अंदर भी कुछ खिलने लगेगा। इसी तरह किसी उदास और रोते हुए व्यक्ति को देखिये आपके अंदर भी थोड़ी उदासी और दर्द उतर जायेगा।

कोई आप की तरफ मुस्कुरा के देखे आप के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ जाती है, कोई आप को क्रोध से भरकर देखे तो आपको भी क्रोध और भय का अनुभव होने लगता है, मौसम मे बदलाव आपके मन, शरीर को व्याकुल या आराम की स्थिति मे ले आता है। अमेरिका, सीरिया, और कहीं भी होने वाल युध्ध आपके देश की शांति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

क्या आपको लगता है कि हम सभी आध्यात्मिक या मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं?

और कितने उदहारण आप देख सकते है, यदि आप चेतनावन और संवेदनशील मनुष्य है तो, नहीं तो आपके आसपास लोग मर जाते है, लूट लिए जाते है हत्या हो जाती है आप अपने काम मे व्यस्त रह सकते है, यह सब जीवंत और चैतन्य मनुष्य को उपलब्ध होता है मृत और अचेतन व्यक्तियों को नहीं।

इसलिए भगवान बुद्ध और महावीर पेड़ों, पौधों, पशुओं और पाषाणों से भी संवाद स्थापित कर पाए और हम मनुष्यों से ही नहीं कर पा रहे है, फर्क सिर्फ चेतना और संवेदना के तल का है, जो जितना चेतनावान और संवेदनशील होगा वो इस अंतर्संबंध को बेहद सूक्ष्मता से देख और समझ सकता है औरों को भी इसकी जानकारी और शिक्षा दी सकता है।

यह सभी परम पुरुष जीवन के रहस्यों की इतनी सूक्षम व्याख्या और दर्शन कैसे निर्मित कर पाए इसी अंतर्दृष्टि और अंतर्संबंध की खोज और समझ के आधार पर।

यदि आप एक संवेदनशील मनुष्य है तो आप इस सम्बन्ध और जुडाव को बेहद गहराई से देख, समझ और अनुभव कर सकते है। सब आपका ही विस्तार है, यह पूरा ब्रम्हांड आपका ही विस्तार है, प्राकट्य है आप इससे भिन्न नहीं और न ही यह आपसे भिन्न है, बस हमे इस रहस्य और परम सत्य का कोई भी पता नहीं है। इसे जानने और समस्त से संयुक्त होने के लिए ही हमे यह जीवन मिला है।

हम डाल से टूटे पत्ते की तरह जीते है, जीवन और जगत के इस अनंत वृक्ष से, हमे वापिस इससे संयुक्त होने की जरुरत है, हमारे जीवन की सारी दौड़, प्यास और तड़प अपने परम रूप से एकाकार होने की चाह है।

क्या आपको लगता है कि हम सभी आध्यात्मिक या मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं?

कभी सोचा है, हम क्यों बड़ा बनना चाहते है, क्यों हममे अनंत विस्तार की आकांक्षा है, क्यों हम सब कुछ पा लेना चाहते है, क्यूंकि यह सब हमारा है ही, यह हम ही है, हमसे अलग और इतर कुछ और नहीं है इस पूरे ब्रम्हांड मे यही परम सत्य है लेकिन हम इसे साधारण बुद्धि और आँख से न देख सकते है न समझ सकते हैं। इसे जानने और समझने की प्रज्ञा और बोध को प्राप्त करना ही हमारे जीवन का परम पुरुषार्थ है।

आप एक हरे भरे वृक्ष को देखिये, उसकी छाँव मे बैठिये, उसे स्पर्श कीजिये, किसी पुष्प को निहारिये, उसकी रंग, नरमी और सुगंध मे खो जाइये, बहते पानी को छूकर देखिये, सख्त चट्टान को स्पर्श करके देखिये, किसी शस्त्र को छूकर देखिये, और किसी शास्त्र को पढ़ कर देखिये।

क्यों किसी की हंसी आपको गुद्गुदा जाती है क्यों किसी का दर्द आपको भी आहत कर जाता है, क्यों किसी की मज़बूरी आपको भी सताती है, क्यों किसी की जीत आपको भी उल्लास से भर जाती है।

क्यों बारिश की बुँदे आपके अंदर के बच्चे को जिन्दा कर देती है, क्यों धरती का सूखापन आपके अंदर भी कुछ खलिश पैदा कर देता है, क्यों हरियाली आपको जीवंत बना देती है, क्या आप इसे देख, समझ और महसूस नहीं कर सकते, फिर आपके इस सवाल का जवाब कभी नहीं मिल सकता।

संवेदनशीलता, परम संवेदनशीलता जब आपको उपलब्ध हो जाती है, तो इस ब्रम्हांड के कण कण मे होने वाली गति, प्रवृत्ति और उर्जा के प्रवाह को आप अपनी साँसों मे महसूस कर सकते है।

यही परम चेतन की अवस्था है और इसी अवस्था मे हमारे मुक्त पुरुषों, ऋषियों और परम योगियों ने अहम् ब्रम्हास्मि का उद्घोष किया है, भगवान कृष्ण ने इसी बोध से भरकर कहा है की मेरी शरण मे आ जाओ मै तुम्हे समस्त तापों और पापों से मुक्त कर दूंगा, यही विश्वरूप है, यही परमात्म बोध है जिसे सिर्फ मनुष्य प्राप्त कर सकते है, इसलिए मनुष्य जीवन का इतना महात्म्य बताया गया है।

आशा है आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा, धन्यवाद।

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