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ईश्वर और धर्म के नाम पर झगडे क्यों होते हैं?

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ईश्वर और धर्म के नाम पर झगड़े क्यों होते हैं?

Quora पर मेरे एक पाठक ने यह प्रश्न पूछा है यदि ईश्वर एक ही है और इंसानियत ही धर्म है तो फिर ईश्वर और धर्म के नाम पर झगड़े और मार-काट क्यों होते हैं?

सर्वप्रथम ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है, यह मनुष्यों की इजाद है, अपने आपको बहलाने के लिए, यह संपूर्ण ब्रह्मांड, यह विशाल अनंत अस्तित्व ही सत्य है, इसका कोई बनानेवाला या संचालन कर्ता नहीं है, यह स्वनिर्मित और स्वसंचालित है।

ईश्वर एक कल्पना है यथार्थ नही, मनुष्य इस विराट अस्तित्व से सीधे संबंधित या संयुक्त नहीं हो सकता इसलिए उसने ईश्वर के अस्तित्व की कल्पना की ओर अपनी मान्यता को एक स्थूल आकर और स्वरूप प्रदान किया ताकि वो इसके माध्यम से अनंत से संबंधित और संयुक्त हो सके।

और झगड़े संप्रदायों के बीच होते हैं, धर्म का संप्रदायों से कोई लेना देना नहीं है, धर्म व्यक्तिगत खोज से उत्पन्न आत्मबोध है अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होना है, इसका किसी भीड़ या समुदाय से कोई भी लेना देना नहीं है, इस धरती पर सिर्फ सांप्रदायिक और अंधविश्वासी लोग ही युद्ध और हिंसा में रत रहते हैं, यही उनका असली काम और धंधा है।

यह लोग जो आपस में लड़ रहे हैं, इनमे से किसी का भी धर्म से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, यह सिर्फ अपने अहंकार प्रेरित पूर्वाग्रहों और स्वार्थों और खुद को दूसरों से बेहतर और ऊंचा सिद्ध करने के पागलपन से ग्रस्त है, और इनके जैसे पागलों और अस्वस्थ् लोगों ने सारी पृथ्वी को रक्त और हिंसक युद्धों से भर दिया है।

पिछले दो हजार साल से यह बीमारी अब्राहमिक मान्यता वाले लोगों ने इस धरती पर फैलाई है, इन्होंने अपने पागलपन में इस धरती को हत्या, लूट और बलात्कार जैसे नृशंस और अमानवीय कृत्यों से भर कर मनुष्यता को लज्जित किया है।

उन्होंने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा और कुत्सित इरादों को पूरा करने के लिए यह धर्मयुद्ध या जेहाद की आड़ का निर्माण किया, असल लक्ष्य था लोगो को अपना राजनैतिक गुलाम बनाना और उन्हें हर तरह से लूटना, इनके पहले धर्म के नाम पर युद्ध, आतंक और परिवर्तित करने की बीमारी दुनिया में नहीं थी।

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इनके पहले पूरी पृथ्वी पर सनातन धर्म का ही प्रभाव था, जो वस्तुतः एक जीवंत विचार एवम् अनुसंधान की सतत और विकसित प्रक्रिया रही है, जो किसी भी बद्ध धारणा और विचार से ग्रस्त नहीं रही।

और इसे किसी पर कभी भी थोपा नहीं गया, क्यूंकि यहां ऐसा कोई विचार ही नहीं रहा कभी, यहां आस्तिक, नास्तिक, भोगवादी, आध्यात्मिक और सभी विचार और जीवन पद्धतियों की स्वीकृति रही है।

क्यूंकि सत्य की खोज या धर्म अंदर की बात है, उसका किन्ही भी बाह्याचार, धारणाओं और मान्यताओं से कोई भी संबंध नहीं है, दरअसल धर्म की यात्रा ही इन बीमारियों से मुक्त होने से प्रारंभ होती है, यह शून्य या परम की खोज है अपने अंदर, बाहर से इसका कोई भी संबंध नहीं रहा कभी भी, ना कभी भी होगा।

यह खोजियों और सत्य के साधकों की खोज का विज्ञान है, जिसमे हजारों सालों में लाखो सिद्धों, ऋषियों, अवतारों और मुक्त पुरुषों ने अपने सत्य के अनुसंधान और परम चेतना को उपलब्ध करने की विधियां, पद्धतियां और प्रयोगों को सभी लोगों के लिए विभिन्न व्यक्त और अव्यक्त रूप में प्रकाशित और वितरित किया है।

जिसमे उपलब्ध ज्ञान विज्ञान, साधना पद्धतियों का सत्य साधकों द्वारा योग्य मार्गदर्शक की देखरेख में और अपनी समझ और रुझान के अनुसार खोजकर, प्रश्न करने और प्रयोग कर अनुभव उपलब्ध करने और उसे दूसरों तक हस्तांतरित करने का विधान है।

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यह एक खोजपरक, जिज्ञासा और संदेह आधारित ज्ञान और अनुसंधान करने का विधान है, और जो इस आत्मज्ञान कि खोज के मार्ग पर अग्रसर होता है वहीं धार्मिक है, और अपनी लगन, साधना और भक्ति से जब उसे अपने आत्मस्वरुप का साक्षात्कार हो जाता है तब वह वास्तविक धर्म को उपलब्ध होता है।

इसके अलावा सभी बद्ध धारणाएं, मान्यताएं, सिद्धांत और ज्ञान बकवास और अनर्थकारी है, और यह तथाकथित धार्मिक (सांप्रदायिक) लोग इसी अधकचरी जानकारी और मृत धारणाओं को लेकर एक दूसरे की छाती में तलवार घोंपने और एक दूसरे से लडने के लिए सदैव तैयार रहते है।

धर्म के लिए युद्ध नहीं होते, युद्ध होते है राजनैतिक और आर्थिक सामाजिक आधिपत्य के लिए, सत्ता, संपत्ति  के लिए और दूसरों की छाती पर सवार होकर उन्हें अपने आधीन करने के लिए।

युद्ध सदैव सत्ता, स्वार्थों और कुत्सित इरादों की पूर्ति के लिए किए गए है या इन गलत बातों को रोकने के विरोध में, धर्म की आड़ इन हत्यारों, लुटेरों और राक्षसों  को इन्हे अपने नीच उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक झूठा भ्रम और जाल फैलाने में मदद करता है।

धर्म प्रेम और करुणा सिखाता है, सभी प्राणियों और समस्त जीवों के जीवन के अधिकार का संरक्षण करता है, इस जगत और जीवन के सभी वास्तविक और वैश्विक नियमों की प्रतिष्ठा और संचालन करता है। धर्म जीवन विधायक व्यवस्था है, जीवन हंता नहीं।

धर्म मनुष्य को पशु से परमात्मा होने का मार्ग प्रशस्त करता है, धर्म समस्त के कल्याण का विधान है वो किसी भी जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के लोगों की मूढ़ता, अंधता और लालच और पूर्वाग्रहों का प्रतिनिधि और विधान नहीं है।

इस पूरी पृथ्वी पर 99.9% लोग धर्म के नाम पर मूढ़तापुर्ण बातें, कर्मकांड, और पागलपन में व्यस्त है, जिसका परिणाम यह अंतहीन युद्ध, हत्या और आतंक का सिलसिला है जो लोगो की मूर्खता और अचेतन जीवन शैली और अहंकार का परिणाम है।

धन्यवाद।

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