धर्म गुरूओं के संबंध में आपकी क्या राय है?

धर्म गुरूओं के संबंध में आपकी क्या राय है?

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मेरे पाठकों में से कुछ ने पूछा है की धर्म गुरूओं के संबंध में आपकी क्या राय है? मेरी रुचि किसी भी किस्म के धर्मगुरुओं में नहीं है, मै बुद्ध पुरुषों, रहस्यवादियों और सत्य के खोजियों और उद्घोषकों में रुचि रखता हूं, यही हमारी संस्कृति और आध्यात्मिक शिक्षा का सार है, मानो नहीं जानो, जो स्वयं की खोज में उतरने और उसमे विकसित होने में सहयोगी हो वही गुरु बाकी सब दुकानदार, और कुछ ना कुछ बेचने वाले लोग।

दुनिया के तमाम तथाकथित धर्मगुरुओं का सत्य 

धर्म गुरूओं के संबंध में आपकी क्या राय है?

सभी तथाकथित धर्मगुरु, मौलवी, पादरी, पंडित अपनी मान्यताओं, तौर तरीकों और मनमानी बातों को लोगों की छाती पर थोपनेवाले, उनका शोषण करने वाले,  बिना अनुभव और वास्तविक ज्ञान युक्त और कोरे पंडित होते है, जिन्हे वास्तविक धर्म का मर्म और सत्य नहीं ज्ञात होता, और ना उनकी इसमें रुचि होती, उन्हें उनकी दुकान चलाने के लिए अंधभक्तों और अंधविश्वासियों की भीड़ चाहिए होती है।

जो उनका गुणगान करे, उनका कारोबार चलाने में मददगार हो, उनकी स्वार्थपूर्ति और महिमा मंडन में सहयोगी हो ऐसे तथाकथित गुरुओं के अपने एजेंडा और स्वार्थ होते है, उनका सत्य और धर्म से कोई लेना देना नहीं होता, उन्हें धर्मगुरु कहना अपराध है वो सांप्रदायिक नेता या किताबी पंडित, मौलवी से ज्यादा नहीं है। 

इनकी सारी विद्वता का आधार धर्मग्रंथ होते है, जिनके मनमाने अर्थ यह निकाल कर लोगों को दिग्भ्रमित कर उनकी मूर्खता, भय, लोभ और अंधविश्वासों का शोषण करते है, यह दुनिया में सभी रोगों के निर्माता, प्रचारक और प्रसारक है, और दुष्ट और खतरनाक राजनीतिज्ञ इनके सबसे घनिष्ठ मित्र होते है, और इन दोनों की जुगलबंदी से पूरा विश्व पीड़ित रहा है प्रारंभ से और आज भी है और सदा रहेगा।

क्यूंकि अंधे लोग इन सांप्रदायिक नेताओं के द्वारा रचे हुए जाल और अपनी मूर्खता और अंधी दृष्टि की वजह सदैव इनके द्वारा फैलाए गए कपट जाल में फंसकर अपना और दूसरों का विनाश करते रहते है और सच्चे और वास्तविक लोगों को सूली, अपमान और जहर देते है।

धर्म गुरूओं के संबंध में आपकी क्या राय है?
कौन है वास्तविक धर्म गुरु 

वास्तविक गुरु वो होता है जो आपको, आपके सत्य की और उन्मुख होने में सहयोगी और मार्गदर्शक होता है, यही धर्म और धार्मिक होने का वास्तविक अर्थ है सच्चे गुरु दुर्लभ होते हैं और अपने और इस जगत के सत्य को जान चुके होते हैं, अर्थात वो अपने स्वधर्म अपने सत्य को जान चुके होते हैं और उसमें प्रतिष्ठित हो चुके हैं।

एक, आँख वाला ही अंधों को रास्ता दिखा सकता है,  लेकिन दुनिया में अंधे ही अंधों को रास्ता दिखने का प्रयत्न कर रहे हैं वो भी बड़े आत्मविश्वास और आडम्बरों के साथ, वास्तविक गुरु कोई दावा नहीं करते वो सिर्फ आपकी सम्भावना को सच होने में सहयोगी होते हैं, वो इशारे देते हैं, वास्तविक विधियाँ देते हैं ताकि आप अपने आत्म स्वरुप को जान सकें, वो कोई बंधी हुई धारणाएं आपको नहीं देते, वो आपको स्वयं अनुभव में उतरने के लिए सक्षम बनने में सहयोगी होते हैं।

वास्तविक गुरु आपकी बैसाखी नहीं बनते  वो आपको आत्मनिर्भर बनाते हैं, वो आपको स्वयं जानने और खोजने और अनुभव को उपलब्ध होने की दिशा में सहयोगी होते हैं, वो एक उत्प्रेरक की तरह होते हैं जो आपकी आतंरिक सम्भावना को प्रकट करने में उपयोगी होते हैं।

वो एक मार्गदर्शक हैं, दिशा सूचक की तरह होते हैं ताकि आप सही मार्ग की और गति कर सकें और आतंरिक विकास को उपलब्ध हो सकें, वो आपको कोई धारणा और ज्ञान नहीं देंगे वो आपको शून्य और खाली होने में मददगार होंगे, ताकि आपका सत्य आपके सामने प्रकट हो सके, यही आत्मोपलब्धि धर्म है, वास्तविकता है और ऐसे व्यक्ति ही वास्तविक गुरु होते हैं।

एक बात जान लीजिये धर्म का अर्थ स्वयं के सत्य को जानना और खोजना होता है,  कुछ भी पहले से मानना नहीं, तथाकथित संगठित संप्रदाय, जो धर्म का अर्थ भी नहीं जानते इस सम्बन्ध में बड़ी बड़ी बातें करते है और मूढ़, अंधे और सिरफिरे पागलों का बहुत बड़ा समूह हैं, जो किन्ही कपोल कल्पित मान्यताओं के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं।

वो अपनी मूढ़ और असत्य और अमानवीय मान्यताओं के सम्बन्ध में कोई तर्क पूर्ण बात और सत्य सुनने समझने को तैयार नहीं होते, यह लोग कभी भी धर्म को उपलब्ध नहीं हो सकते जो भी मानने पर जोर देते हैं, और बिना किसी भी बात की वास्तविकता, अर्थवत्ता और सत्य को जाने बिना स्वीकार कर लेते हैं और दुसरों को भी इस मूर्खता को स्वीकार करने के लिए अमानवीय तरीके इस्तेमाल करते हैं, यह धरती पर सबसे बीमार और खतरनाक लोग हैं।

मै सिर्फ बुद्ध पुरुषों को गुरु के रूप में स्वीकार करता हूं जैसे राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, आदि शंकर, चैतन्य महाप्रभु, मीरा, नानक, कबीर, दादू, पलटू, रैदास, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, ओशो, और वर्तमान में सदगुरु जग्गी वासुदेव जैसे हजारों लोग जो इस महान धरा पर अवतरित हुए है हजारों सालों से यहां इस पुण्य सलिला भारत भूमि पर।

यह सभी किसी धर्म, समाज, जाती विशेष से संबंधित नहीं है यह सब प्रेम, योग, ध्यान और भक्ति इन सभी मार्गों के विशिष्ट साधक और खोजी रहे है और इन्होंने अपने जीवन में परम सत्य को उपलब्ध किया है।

इन सभी परम चेतना को उपलब्ध मनीषियों और सिद्ध पुरुषों के अलावा बाकी सभी लोग सांप्रदायिक प्रचारक है, उनमें से कोई भी धर्म से संबंधित नहीं है ना ही गुरु कहलाने लायक।

वो सिर्फ कथावाचक और शास्त्री है, मुल्ले, पादरी और मौलवी हैं,  उनकी समझ और पहुंच किताबों ने लिखे से आगे और ज्यादा नहीं है, और धर्म यानी आंतरिक जगत के संबंध में इनका कोई भी व्यक्तिगत अनुभव और उपलब्धि नहीं है।

मेरी नजर में ना इनसे ज्यादा ना उनका कोई मूल्य है ना महत्व, धर्म अंदरुनी बात है इसका बाहयोपचरों, पाखंडों और आडंबरों, रूढ़ मृत मान्यताओं और मुर्दा सिद्धांतों से कोई भी लेना देना नहीं है।

धर्म जीवंत अग्नि है जिसे भगवान शिव ने जगत को दिया ध्यान और योग के रूप में , ताकि मनुष्य अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर गति कर सके और अपने वास्तविक स्वरूप को जान सके और संसार के चक्र से मुक्त होकर आत्मोपलब्धि की ओर अग्रसर हो सके।

सदगुरु ही सच्चे गुरु होते हैं, सांप्रदायिक नेता या किसी पंथ को मानने वाले, उनका प्रचार करनेवाले नहीं, इस धरती पर वास्तविक धर्म गुरु बिरले हैं बाकि सब अपने सम्प्रदायों और मूढ़ मान्यताओं के प्रचारक, इनका काम अपने मत या संप्रदाय का झंडा ऊँचा करना और बाकि सभी की निंदा और उन्मूलन और परिवर्तन अपने मत या संप्रदाय में हर निकृष्ट तरीके से, कुछ मानने वालों  की संख्या में बड़े संप्रदाय इसी तरह विकसित हुए हैं पिछले 1500 साल में।

यह पूरी दुनिया में अशांति और विग्रह के जन्मदाता हैं और सबसे बड़े आतंकवादी और मनुष्यता के शत्रु हैं, इनसे सावधान रहना और इनके दूषित प्रभाव से मुक्त रहना ही उत्तम है, इन सभी सांप्रदायिक प्रचारकों का जो छद्म रूप से अपने को धर्मगुरु कहलाने का  धंधा करते हैं।

इन सभी का सारा धंधा चलता है लोगों के अज्ञान और उनकी अचेतन बुद्धि और भय और लालच पर, स्वर्ग नरक का धंधा और परलोक की मनघडंत कहानियों और प्रलोभनों पर, कोई भी चेतनावान मनुष्य इन गधों और मूर्खों की बातों को बहुत महत्त्व नहीं दे सकता न इनके पाखंड शोषण और मूढ़ता के व्यापर का समर्थन कर सकता है, यही मनुष्य होने का अर्थ और सार्थकता है।

धन्यवाद।

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