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भारतीय संस्कृति शाश्वत क्यों है?

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भारतीय संस्कृति शाश्वत क्यों है?

भारतीय संस्कृति शाश्वत क्यों है? क्यूंकि इसका आधार स्वतंत्रता और स्वीकृति है,  किसी भी तरह का जबरदस्ती और बल पूर्वक आरोपण नहीं है, क्यूंकि जो थोपा जाएगा वो आपको गुलामी और हीनता में ले जाएगा, जैसा विश्व के दूसरे धर्मों के साथ है वो बलपूर्वक मानने का आग्रह करते है, अमानवीय, अनैतिक भय और दंड के विधान के साथ।

हमारी देवभूमि में विकसित सभी विचार और जीवन की पद्धतियां, मुक्ति का पथ है, जागृति और जानने के मार्ग है, वो आपको प्रश्न करने, खोज और अनुसंधान करने, प्रयोग करने, अनुभवों में उतरने की विधियां और विधान प्रस्तुत करते है।

यह संस्कृति प्रेम और करुणा की प्रतिष्ठा करती है यहां सत्य की खोज पर जोर है, यहां जानने की शिक्षा दी जाती है मानने की नहीं, यहां कुछ भी आंख मूंद कर मानने कि विवशता और बंधन नहीं है,  यही इसे सबसे अलग और विशिष्ट बनाता है

यह सबको समाविष्ट करने के लिए सदैव प्रस्तुत है, यह एक अनंत प्रवाह है, जिसमें सबकुछ समाहित हो सकता है, और यह अपनी अनूठी प्रकृति और विशिष्ट गुणवत्ता के साथ सबसे अलग, सबको जीने का मार्ग और चेतना प्रदान करती रही है, करती रहेगी सदा सदा।

इसने जीवन साधना और विचार की समस्त पद्धतियों और व्यवस्थाओं को आत्मसात और अंगीकृत किया है, यह दुराग्रही नहीं है, पूर्वाग्रही नहीं है, यह सभी मतों और दृष्टिकोणों को बिना भेद भाव के स्वीकार करती है।

hindu devotees from russia

आज पूरे विश्व में सनातन परंपरा में लोग हृदय से स्वेच्छा पूर्वक उतर रहे हैं, बिना किसी प्रचार के, और बलपूर्वक या लोभ या लालच देकर धर्म परिवर्तन किए बिना, यही हमारी संस्कृति का सबसे बड़ा और उजला पक्ष है
यदि आप में कुछ श्रेष्ठ है तो वह लोगों के ह्रदय और जीवन को अपने आप प्रभावित करेगा और अपनी और खींचेगा, आपको व्यर्थ के उपद्रव करने की जरुरत नहीं है, सारा विश्व अमेरिका, रूस, जर्मनी और अन्य विकसित पश्चिमी राष्ट्र आज सनातन धर्म और इसकी विराट और वैश्विक दृष्टि से अभिभूत हैं और इसे अपने जीवन में अंगीकार कर रहे हैं

यह वैश्विक नियमों और विधान पर आधारित है, यह समस्त जीवन और प्राणी जगत के उदभव और उत्थान के लिए है किसी विशेष समूह या संप्रदाय के लिए नहीं, और ना  ही सीमित है किसी विशेष व्यक्ति या बात और विचार तक।

यह अत्यंत विराट और विस्तृत है, और सबका स्वीकार और अभिनन्दन करती है, इसके लिए कोई पराया या अयोग्य नहीं है, यह सबको शामिल करने की प्रकृति और विधान से युक्त है।

भारत के बाहर जन्मे दूसरे सभी सम्प्रदायों के फैलने की मुख्य वजह जोर जबरदस्ती, हत्या, लूट, प्रलोभन और राजनीतिक महत्वकांक्षा  है, उनका उद्देश्य राजनैतिक और उन्मादी था, है और रहेगा सदा, वो इस धरती को सदैव हिंसा और अमानवीय तरीकों से त्रस्त करते रहेंगे, कर रहे हैं।
उनके विस्तार और अधिक संख्या की जड़ में जघन्य अमानवीय तरीके और अपराध हैं, उन्होंने अपनी दूषित और उन्मादी और संकीर्ण विचारधारा और रुग्ण मानसिकता और घृणित तरीकों की वजह से अपनी संख्या बढाई हैं।

सनातन परंपरा लोगो के हृदय और आत्मा को जीवन के सभी तलों पर छूती है, इसका आधार प्रेम, सहिष्णुता और करुणा है, यह सबके कल्याण का लक्ष्य रखती है और संपूर्ण विश्व को एक परिवार की तरह स्वीकार करती है।

यही बात हमारे राष्ट्र और हमारी प्रेम और करुणा आधारित संस्कृति की विशिष्टता और श्रेष्ठता का आधार है, इसलिए यह 15000 वर्षों से अधिक से अक्षुण्ण है और सारे विश्व को इसने सभ्यता और संस्कृति सिखायी है, साथ ही जीवन के गहनतम सत्यों से परिचय कराया है, विश्व की अन्य सभी परम्पराओं में हुए परम पुरुषों और श्रेष्ठ आत्माओं ने हमारी संस्कृति से प्रेरणा और ज्ञान प्राप्त किया है, और अपने जीवन और उपदेशों में उन्हें पिरोकर अपने लोगों तक पहुँचाया है, हमारी संस्कृति और विचार वैश्विक है, हमे हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर गर्व है।

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इसका वजूद सदा रहा है और रहेगा, क्यूंकि यह दमनकारी और आक्रामक नहीं है, यह सभी को और बेहतर करने और ऊपर उठने की व्यवस्था खोजने, आविष्कृत करने और उसे अंगीकार करने के लिए आमंत्रित करती है, प्रस्तुत रहती है।

हमारी संस्कृति और मूल्य, बंधनकारी और जड़ नहीं है, यह मनुष्य को पशुता से ऊपर उठकर, परमात्मा होने की व्यवस्था होने की व्यवस्था और विधान प्रस्तुत करती है, यह एक विराट धारा है अपने में हर विचार, दृष्टि और रचनात्मक कार्य को स्वीकार करती है और यह मनुष्य की एकमात्र अभिलाषा और परम पुरुषार्थ का इंगित करती है, और उस ओर जाने का, उसे प्राप्त करने के संकेत, निर्देश और विधियां प्रस्तुत करती है। 

संपूर्ण विश्व ने इसकी ज्ञान और विचार की अमूल्य धरोहर से अपने आपको किसी ना किसी रूप में विकसित और प्रतिष्ठित किया है, लेकिन हम ही इसे खो चुके है और इसकी जड़ों से पूरी तरह कट गए है।

जरूरत है इसे पुनः इसके विराट और गौरवमय स्वरूप में आविष्कृत करने की और उसकी प्रतिष्ठा करने की।

जय भारतवर्ष, जय माँ भारती 

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