चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है  

मनुष्य जाति का सारा उत्थान चेतना के  विकास का परिणाम है, जो भी भौतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति मनुष्य ने हजारों वर्षों मे की है वो सिर्फ हमारी चेतना के विकास से संभव हुआ है I

मनुष्यों और पशुओं मे भी यह फर्क इसलिए है क्यूंकि मनुष्य ने अपनी रीढ़ को सीधा रखकर दो पैरों पर चलना सीखा और यह संभव हुआ उसकी चेतना के विकसित होने की वजह से, और मनुष्यों मे ही यह सम्भावना प्रकट हुई है पशुओं मे नहीं I मनुष्य का विकास उसकी चेतना के विकास की ललक और कोशिश का नतीजा है I

यह हम सबकी सम्भावना और नियति है मनुष्य होने की वजह से लेकिन इसके लिए प्रयास करना, न करना हमारे हाथ मे है, हम निरे पशु प्रवृत्तियों मे पड़े रहकर अपना और दूसरों का जीवन नष्ट करते रह सकते है या इसे देवों को भी दुर्लभ स्थान और अवस्था तक ले जा सकते है I चुनाव सदैव हमारा ही होता है I

एक बात आप सभी ने अनुभव की होगी की जो पशु, मनुष्यों की संगत मे या संपर्क मे रहते है, उनमे बहुत सारी संवेदनाओ और भावनाओं को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य विकसित हो जाती है, यह भी मनुष्यों की संवेदनशीलता, करुणा, उनके प्रति प्रेम, विकसित चेतना और बुद्धिमत्ता के कारण संभव होता है, की वो पशुओं मे भी उन संभावनाओ को बढ़ा देते है I

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

इस प्रकार आप देख सकते हैं की उत्तम प्रकृति और चेतना संपन्न व्यक्तियों के संपर्क मे ही और उचित और करने योग्य कार्य करके हमारी या किसी की भी चेतना के स्तर मे परिवर्तन किया या देखा जा सकता है I क्या आप अपनी चेतना के रूपांतरण के लिए तैयार हैं? पृथ्वी पर दो किस्म के ही मनुष्य और जीव पाए जाते हैं सुप्त और जागृतI देखिये आप किस किस्म के मनुष्य है?

लगभग ९९% मनुष्य और दुसरे जीव सुप्त अवस्था मे जीवन जीकर समाप्त हो जाते है और यह चक्र चलता रहता है, जब तक आप के भीतर जागने और अपने अस्तित्व के गहरे और बेहतर तलों को जानने और छूने की प्यास नहीं जग जाती I मनुष्य,  पशु से मनुष्य और मनुष्य से परमात्मा होने की सम्भावना का मध्य बिंदु है I इसलिए उसमे पशुओं की सारी प्रवृत्तियां और उनसे बहुत बेहतर और बदतर दुसरे आयामों तक जाने की शक्ति, और संभावना मौजूद है I

मनुष्यों को अपने विकास के लिए स्वयं प्रयास करने पड़ते है यहाँ कोई भी प्रगति और विकास अपने आप नहीं होता, यदि आप मे गहरी ललक और अभिलाषा हो विकसित और उन्नत होने की तभी यह संभव हो सकेगा, यही इस जीवन का परम उद्देश्य हैI

आप देखेंगे की पशु अपने जन्म के साथ ही जीवन जीने, अपने अस्तित्व को बचाने की सारी योजना और विधि के साथ ही जन्म लेते है,  जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक कोई आतंरिक विकास उनके जीवन मे नहीं होता, वो पशु ही जन्म लेते है और पशु ही मर जाते है I यह अलग बात है की हमे अपने आसपास कुछ पशुओं मे मनुष्यों से ज्यादा संवेदन शील प्राणी और मनुष्यों मे अत्यंत बर्बर और भयानक दानव मौजूद है I

पृथ्वी पर जिन मनुष्यों, समुदायों ने मानवीय चेतना के परम शिखर को छुआ है उन्होंने बेहद गहरे अनुसन्धान और खोजें की है मनुष्य के मस्तिष्क और आतंरिक रहस्यों के सम्बन्ध मे, और यही हमारी सबसे कीमती धरोहर है I

हम पहले से बहुत  बेहतर उपकरण, अविष्कार बना चुके हैं और तकनीकी प्रगति कर चुके हैं लेकिन बिना विकसित चेतना के यह सब हमारे विनाश की सामग्री और सामूहिक आत्महत्या का साधन बन चुके है I महज बौध्दिक विकास मनुष्य और सभी मनुष्यों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता है I बिना चेतना के विकास के सारी प्रगति आत्मघात की तैयारी है I

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

चेतना का विकास ही हमें सार्थक और रचनात्मक आयामों से जोड़ता है और हमारी उर्जा और सामर्थ्य को स्वयं के और सर्व के कल्याण मे नियोजित करने की शक्ति, समझ और प्रेरणा अर्जित करने का माध्यम बनता है I विकसित चेतना हमे हमारे परम और ब्रम्हांडिय स्वरुप और आयाम से जोडती है I चेतना के परम विकास से ही मनुष्य अस्तित्व के समस्त तलों के पार देखने और समझने मे सक्षम हो जाता है, वो हर बात के पीछे कार्य और कारण के सम्बन्ध को जानने मे सक्षम हो जाता हैI

बिना चेतना के विकास के मनुष्य विनाशकारी और भयंकर पशु और दानव ही बन सकता है, इतिहास ऐसे तमाम नरपशुओं और विनाशकारी बुद्धि और वासना रखने वाले अहंकारी नर पिशाचों के नृशंस और अमानवीय कार्यों से भरा हुआ है I

मनुष्य ने अपने विकास के आंतरिक और बाह्य सभी आयामों मे अपनी चेतना और बुद्धिमत्ता के विकास की वजह से अद्भुत परिणाम और उब्लब्धियाँ व्यक्तिगत और सामूहिक कल्याण के लिए अर्जित की है I

साथ ही सुप्त चेतना और अज्ञान की वजह से भयानक विनाश और संकट मनुष्य जाति और समस्त सहजीवियों के लिए उत्पन्न किये है I यह हमे तय करना है की हम किस दिशा और परिणाम को प्राप्त करना चाहते है, चुनाव सदा हमारा ही होता है I

यह भी देखा गया है की जो समाज या समुदाय जितना अधिक चेतना संपन्न होगा उन सभी मे मानवीय एवं दैवीय  विभूतियाँ, रचनात्मकता, कला एवं साहित्य और सृजन के सारे आयामों मे अभूतपूर्व अविष्कार और सृजन किया जा चुका है I

समस्त मानवीय कल्याण इस बात पे निर्भर है की व्यक्ति, व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से कितने चेतनाशील है, जिन समाजों, समुदायों मे चेतना का विकास नहीं हुआ है या अवरुद्ध हुआ है या किया गया है वे आज भी मनुष्य रूप मे पशुओं से भी ज्यादा बदतर है और अपने और सारे विश्व के लिए अभिशाप और भयंकर सिद्ध हुए है, हो रहे हैं I

चेतना हमें तरल और गतिमान रखती है, बिना चेतना के मनुष्य जड़बुद्धि और विचार, विवेक विहीन हो जाता है यही उसका सबसे विकृत और बीमार स्वरुप होता है I संसार मे दो ही किस्म के लोग है सुप्त और जागृत और दुर्भाग्य से इस पृथ्वी पर ९९% लोग सुप्त अवस्था मे जीते हैं और मर जाते है I 

जिन संस्कृतियों और सभ्यताओं मे चेतना के विकास पर सर्वाधिक कार्य किया गया है मनुष्यता के पूरे इतिहास मे उनमे भारतवर्ष सर्वोपरि है, यहाँ विगत हजारों वर्षों  मे अभूतपूर्व कार्य हमारे मनीषियों, सत्य साधको एवं ऋषियों द्वारा इस सम्बन्ध मे संपन्न किया गया है I

उन्होंने परम वैज्ञानिक विधियाँ और मार्ग खोजे हैं चेतना के महत्तम विकास और आत्मज्ञान प्राप्ति की दिशा मे और समस्त विश्व के कल्याण और बेहतरी के लिए I योग और साधना की सैकड़ों विधियां सभी जिज्ञासु और साधकों के लिए उपलब्ध है I

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

भारतवर्ष मनुष्य की चेतना के विकास का गौरीशंकर है, परमशिखर है , यह देवभूमि है और समस्त विश्व की आध्यात्मिक राजधानी है, हमे जानना और समझना होगा की हमारे यहाँ बाह्य और आतंरिक विज्ञान की महत्तम खोज हमारे खोजियों और आत्मज्ञानियों ने हजारों वर्ष पूर्व की थी और उसकी विराट अविरल धारा आज भी अविरल रूप से यहाँ विद्यमान है, हमे जरुरत सिर्फ उससे जुड़ने की है I

विगत १२०० वर्षों मे चेतना और विकास की यह धारा अवरुद्ध कर दी गयी है, हमें उससे तोड़ दिया गया है, हमारा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दूषण और विद्रूपन करके I  हमारी भूमि पर आक्रान्ताओं और लुटेरों के आक्रमण और विदेशी दासता ने हमें हमारी जड़ों से काट दिया है, अब वक़्त है उन जड़ों से पुनः संयुक्त होने और उस धारा को पुनर्जीवित करने का I

चेतना के विकास के बगैर मनुष्य निम्नतम कोटि का पशु है, हमें उन समस्त संभावनाओं को प्रकट और अभिव्यक्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए जो हमारे मनुष्य होने की वजह से हमें मिली हुई है और जिनका हमे कोई भी पता नहीं है I

हमारा जीवन भोजन, निद्रा और प्रजनन पर समाप्त होने के लिए और मूर्खतापूर्ण महत्वकान्क्षाओं और विचारों मे नष्ट करने के लिए नहीं मिला हुआ है I क्या हम इस बात के प्रति जागरूक है?

हमने उन सभी व्यक्तियों को सर्वाधिक सम्मान और प्रेम दिया है जो चेतना के परम विकास को उपलब्ध हुए हैं और हमारे जीवन को रूपांतरित करने और उसे गौरवमयी बनाने की शिक्षा और मार्ग हमे सिखाया है I

साथ ही हमने अपनी मूढ़ता, अज्ञानता और सुप्त चेतना की वजह से उन सभी को उनके जीते जी नष्ट करने और सूली पर चढाने की कोशिश भी की है, निन्दित और प्रताड़ित भी किया है, क्यूंकि समाज और विश्व का बहुत बड़ा हिस्सा सुप्त, सदा से ही अचेत और मूर्छित लोगों से भरा हुआ रहा है और वो किसी भी चेतनावान, सत्यनिष्ठ और जागृत व्यक्ति को अपने बीच बर्दाश्त नहीं कर पाते, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है I

सारी दुनिया के अलग अलग कोनो मे ऐसे चेतनावान मनुष्य हजारों साल से अलग अलग नाम रूप मे जन्म लेकर लोगो को अपनी आतंरिक समृद्धि और परम विकास के लक्ष्य की यात्रा का निमंत्रण देने आते रहे है, आते रहेंगे, क्या हम तैयार है उनके निमंत्रण को स्वीकारने और स्वयं को अनंत की खोज की इस महायात्रा पर गतिमान करने के लिए I

यही हमारे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है, चेतना का एवं स्वयं का सभी रचनात्मक आयामों मे महत्तम विकास करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है, क्या आप इस कार्य मे संलग्न है? और यदि नहीं तो आप यहाँ क्यूँ  हैं और क्या  कर रहे है?

हमारी समस्त संवेदना और रचनात्मकता का मूल हमारी जागृत और उर्ध्व उठती चेतना है, वही इस जगत की सबसे बड़ी शक्ति और मनुष्य की सर्वश्रेष्ट अभिव्यक्ति है I हमारे सारे श्रेष्ठ इतिहास पुरुष, ऋषि, अवतार और मनीषी इस बात के जीवंत प्रमाण है I

हजारों साल के हमारे और मनुष्यता के इतिहास मे जब भी कोई व्यक्ति, समाज, समुदाय, देश चेतना विहीन हुआ है उसने अपने पतन के लिए जिम्मेदार स्थिति का निर्माण किया है और तमाम विसंगतियों , दुर्बलताओं और विनाशकारी और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं और परिस्थितियों की सृष्टि की है I

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

हम कैसे अपनी चेतना का विकास कर सकते है?

जितने अधिक सजग हम होंगे, और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हमारे जीवन और कर्म मे होगी उतनी ही हमारी चेतना मुखर और शुद्ध होगी I इसके लिए हमे अपने आप से जुड़ना होगा और स्वयं के सम्बन्ध मे जो सत्य है उसे जानना होगा I यही हमारी इस दिशा मे यात्रा का प्रथम चरण है स्वयं के प्रति जागरूक होना और स्वयं के सम्बन्ध मे सबकुछ जानना और समझना I

हर एक व्यक्ति एक विशिष्ट क्षमता और गुण से भरा होता है, उसे पहचानना होगा की उसकी मूल प्रकृति क्या है, और कौन सी बातें उसके विकास को महत्तम तलों पर ले जा सकती है I उसे उन तमाम संभावनाओं को विकसित करने की दिशा मे कार्य करना होगा I

यह प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही खोजना होता है, हां हमारे आस पास और साथ के योग्य और अनुभवी व्यक्ति इसमें हमारी मदद कर सकते है, वो सभी जिन्होंने स्वयं के सम्बन्ध मे इसे प्राप्त कर लिया है, चाहे वे अतीत के हो या वर्तमान के I

सिर्फ प्रकशित हुआ दिया ही दुसरे के बुझे दियों को रोशन कर सकता है, अपने बीच उन रोशन दियों को खोजो और प्रकाशित हो जाओ, और दूसरों को प्रकशित होने मे सहयोग करो I यही मनुष्य का मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है I

हमें यह सब जानना और सीखना होता है, मनुष्यों को अपने विकास के लिए स्वयं प्रवृत होना होता है, यह आपके लिए कोई और नहीं कर सकता, जैसे भूख लगने पर आप को ही भोजन करने से तृप्ति मिल सकती है, आपके स्थान पर कोई और भोजन नहीं कर सकता, इसका कोई भी विकल्प नहीं है I इसलिए इस दिशा मे कोई छोटा और त्वरित मार्ग नहीं है I

कुछ कार्य हमारे जीवन मे ऐसे हैं जिन्हें हमे खुद ही करना होता है और वे उनके लिए ही सहज और आनंददायी होते है जिन्होंने स्वयं के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण भरा जीवन जीने का संकल्प किया है, और उसे लगातार नए आयामों पर ले जाने के लिए हर संभव प्रयास और परिश्रम कर रहे है, तमाम बाधाओं और प्रतिकूलताओं के बावजूद भी I

हमारी बहुआयामी प्रकृति और हमारे आस पास का संपूर्ण जगत इसमे हमारी मदद कर रहा है, बस हमे इसे समझने की जरुरत है, की क्या हम अपने पक्ष मे कर रहे है और क्या अपने ही विरुद्ध I यह बात को जानना और समझना ही सारी बातों का मूल  है I

यदि हम विकसित होना चाहते है, बेहतर होना चाहते है, तो जीवन के किसी भी आयाम मे जो हमसे जुडा हुआ है, इसके लिए आवश्यक, प्रयास, परिश्रम और शिक्षा हमे ग्रहण करनी ही होगी, वो भी श्रेष्ठ और उपयुक्त व्यक्तियों और स्थान से ताकि हम सही दिशा मे कार्य करके अपना श्रेष्ठ उत्पन्न कर सके,  स्वयं के लिए और सभी के लिए I

मैंने अपने दीर्घकालीन अनुभव से और लम्बे समय के रचनात्मक प्रयासों से अपनी चेतना के विकास मे बेहद लाभकारी परिणाम उत्पन्न किये है, जिसके लिए मेरी सजगता, समर्पण, जानने की गहरी प्यास और सत्य का स्वीकार सहयोगी रहे हैI

आप सदैव स्वयं के अवलोकन से यह देख और जान सकते है की कौन सी बातें, आदतें, व्यक्ति, संस्कार, और सोच आपको एक ज्यादा जीवंत, सत्यप्रिय, गुणवान और बेहतर मनुष्य होने मे सहयोगी होते है, और क्या इससे पतित होने मे, स्वयं से बड़ा कोई गुरु और मार्गदर्शक नही, यदि आप सत्यनिष्ठ और आत्मवान है I

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

जो मनुष्य स्वयं के प्रति जागृत और निष्ठावान है, वो इस तथ्य को स्पष्ट रूप से देख सकता है की कौन सी बातें, कार्य और आदतें, व्यक्ति और संगती उसके उत्थान के लिए जिम्मेदार है और कौन सी उसके पतन के लिए I

क्या आप स्वयं के प्रति इतने प्रेमपूर्ण, जागरूक और ईमानदार है? क्या आप अपने और अपने से जुडी हर चीज़ के सम्बन्ध मे सामने खड़े सच का अंगीकार और साक्षात्कार करने के लिए प्रस्तुत है?

कुछ विशिष्ट बातें और कार्य हम सभी को अधिकाधिक चेतनावान होने की दिशा मे सहयोगी हो सकती है, होती है, यदि सही तरीके से उनका पालन और व्यवहार किया जाये, वे निम्नानुसार है जो सभी आत्मवान और परम चेतनावान व्यक्तियों द्वारा अपने जीवन मे, अपने विकास की यात्रा मे अपनाई और लागू की गयी है, हम सभी इन का लाभ लेकर अपनी विकास की यात्रा को सुगम और आनंदपूर्ण बना सकते है –

चेतना विकास के सूत्र 

सत्यनिष्ठा – हर रूप मे, स्थिति मे सत्यनिष्ठ रहना, हर बात, कार्य और व्यक्ति के सम्बन्ध मे सिर्फ सत्य को स्वीकार करना, चाहे कोई भी परिणाम हो, किसी भी अन्धविश्वास, रूढ़ मान्यता और परंपरा का अन्धानुकरण न करना, सत्य को खोजना, जानना, देखना, समझना, जीना और अभिव्यक्त करना, अपने विचार, वाणी और कर्म से I किसी के भी उचित और अनुचित प्रभाव मे आये सिर्फ सत्य को ग्रहण करना ही हमारा इस दिशा मे सफलता पाने का मूल मंत्र है I

करुणा – समस्त के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखना, किसी के भी प्रति उपेक्षित और पूर्वाग्रह युक्त व्यवहार और दृष्टिकोण न रखना, किसी भी बात और व्यक्ति को सिर्फ बाह्य रूप, आचरण और प्रकृति की वजह से स्वीकार और अस्वीकार न करना I जीवन के सभी रूपों के लिए समादर और सम्मान का भाव रखना I यह परम मानवीय गुण है और समस्त दिव्यता का आधार भी I

साहस – चेतना के विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटकों मे से एक है साहस, अन्जान मे उतरने का साहस, विपरीत की चुनौती को स्वीकारने का साहस, रुग्ण प्रतिमानों और बद्ध धारणाओं और पूर्वाग्रहों को तोड़ने का साहस, सत्य और मानवीय गरिमा के लिए सर्वस्व अर्पित करने का साहस I यदि आप मे इस गुण का अभाव है तो इस दिशा मे प्रगति का कोई भी मार्ग नहीं है I समस्त प्रतिकूलताओं मे भी अकेले चलने का साहस और धैर्य I

दृढ संकल्प – इस जीवन और जगत मे कोई भी महान और अविस्मरणीय कार्य सिर्फ दृढ संकल्प और बेहद मज़बूत इच्छा शक्ति की वजह से ही संभव हुए है और सदा होंगे, जिन लोगों मे इसका अभाव हो, जो ढुलमुल, आलसी और सुस्त हो, थोड़े से दवाब और विपरीतता के आगे टूट जाये वो कभी दुर्धर्ष लक्ष्य और महान कार्य को सम्पादित करने की शक्ति और योग्यता अर्जित नहीं कर सकते I

ध्यानपूर्णता – किस भी कार्य को उसकी संपूर्णता मे संपादित करने के लिए उसे अत्यंत ध्यानपूर्वक एवं पूरी सजगता और समर्पित भाव से करने की आवश्यकता होती है, बिना ध्यान और समग्रता के आधे अधूरे परिणाम और निष्कर्ष ही प्राप्त होते है, यह किसी भी किस्म के विकास और सफलता के लिए अनिवार्य गुण है, इसके बगैर वांक्षित सफलता और गुणवत्ता की प्राप्ति संभव नहीं I

आत्म निरीक्षण – चेतना के विकास एवं किसी भी कार्य मे समुचित परिणाम प्राप्ति के लिए स्वयं की तैयारी और जानकारी बेहद महत्पूर्ण घटक है, आप अपनी शक्तियों, क्षमताओं और कमजोरियों के बारे मे कितने जागरूक और सतर्क हैI अपने ज्ञान और अनुभव के बारे मे विचार करना, उसके व्यावहारिक और परिमाण उत्पादक पक्ष का ज्ञान और उचित क्रियान्वयन की योग्यता का होना I 

जानिए, सीखिए, अपने वातावरण से, योग्य और सक्षम व्यक्तियों से, उनके अनुभवों से, उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरणों से I हमारे जीवन मे बहुत सारी बातें हम स्वयं के और हमारे आसपास के लोगो, घटनाओं और संकेतों द्वारा समझते और सीखते है, इसमें निरंतरता और निपुणता होना आवश्यक है I लगातार अभ्यास और सजगता से यह स्वयं घटित होने लगता है I

विवेकपूर्णता – हमारे जीवन और जगत की हर बात के सम्बन्ध मे कार्य-कारण विवेक का होना और प्रश्नात्मक दृष्टिकोण का होना हमे हर बात, व्यक्ति और घटना के सम्बन्ध मे अव्यक्त और अज्ञात परतों और रहस्यों को उद्घाटित करने मे सहयोगी होते हैI  हर बात के सम्बन्ध मे प्रश्नात्मक दृष्टिकोण का होना हमें ज्यादा वैज्ञानिक और व्यवस्थित समझ और निष्कर्षों की ओर ले जाता है I 

हमे सदैव बुद्धिमत्ता पूर्ण तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए, अन्वेषण और संश्लेषण के लिए, जिससे हम ज्यादा सार्थक और गुणवत्ता पूर्ण परिणाम और निष्कर्ष प्राप्त कर सके, जो प्रत्येक समय, काल और परिस्थिति मे सत्य और व्यावहारिक हो I

संतुलित एवं स्वस्थ शरीर – इस जीवन मे सब कुछ प्राप्त करने और महत्तम विकास के लिए हमारा शरीर ही हमारा सबसे मूल्यवान उपकरण और साधन है, इसकी सुरक्षा और समुचित पोषण सबसे प्राथमिक और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है I

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमे शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक आहार लेना चाहिए, ताकि हमारा उर्जा का स्तर हमेशा उच्च रहे एवं हम सभी तरह के कार्य बिना रुकावट और थकान के संपन्न कर सकेI एक कमज़ोर और रुग्ण शरीर कभी भी चेतना के आरोहण, विकास और किसी भी महत कार्य के संपादन के लिए उचित नहीं होता I 

चेतना का विकास ही समस्त कल्याण की आधारशिला है

अपने शरीर को उचित एवं सम्यक आहार और पोषण देना आवश्यक है, हमें स्वाद के लिए नहीं स्वास्थय और उर्जावान बने रहने के लिए सही और उचित मात्रा मे भोजन करना चाहिए I

इसके साथ उचित परिश्रम, व्यायाम एवं आराम भी इसे देना चाहिए, यही हमारी सबसे मूल्यवान संपत्ति है, जो हमारे प्रत्येक लक्ष्य तक पहुचने और सभी आवश्यक कार्यों को सम्पादित करने का सर्वश्रेष्ठ और एकमात्र साधन है I

सत्संग – जीवन मे चेतना के विकास और अपनी योग्यता और क्षमता के विकास के लिए हमे गुणवान और श्रेष्ठ जनों का आश्रय और संगती करनी चाहिए, उनके अनुभवों, सफलताओं और असफलता से सीखना चाहिए I

इसके लिए हमे आवश्यक अध्ययन, अनुसन्धान, जानकारी और ज्ञान प्राप्ति के लिए योग्य शिक्षकों, पुस्तकों और हर संभव वास्तविक स्रोत से जानकारी और ज्ञान अर्जित करना चाहिए, ताकि हम अपने कार्यों को श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करने के लिए उन्हें सर्वोत्तम तरीके से सम्पादित कर सके I

सदैव अपने से ज्यादा अनुभवी, चेतन और श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगत, और उचित संवाद करना आवश्यक है, इससे हमे अपनी चेतना और कुशलता के स्तर को बेहतर करने हेतु हर संभव प्रेरणा और शक्ति प्राप्त होती है I

उद्देश्यपूर्णता – हमारे सर्वांगीण विकास के लिए और विकसित चेतना के लिए हमें सभी कार्य किसी निश्चित और उचित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए करना चाहिए, यदि हमे यही नहीं पता की हम क्या और क्यों कर रहे है तो यह मूर्छित और दिशाहीन व्यक्ति की निशानी हैI 

एक जागृत और चेतनावान व्यक्ति सदैव अपने उद्देश्य और लक्ष्य के प्रति जागरूक और सतर्क होता है, वो कोई भी कार्य बिना एक निश्चित उचित उद्देश्य और लक्ष्य के बगैर नहीं करता, और यह कार्य निश्चित रूप से स्वयं एवं सर्व के कल्याण के उद्देश्य से ही संपन्न किया जायेगा I इसके लिए सभी आवश्यक घटकों का विचार और निर्धारण सबसे प्रथम कार्य होता है I

आत्मानुशासन – चेतना और व्यक्तिगत विकास के सबसे महत्वपूर्ण घटकों मे से एक है आत्मानुशासन, जो व्यक्ति चेतनावान होते है वो अंदर से बाहर की ओर गति करते है, उन्हें बाह्य अनुशासन आरोपित करने की आवश्यकता नहीं होती I 

इसलिए सभी व्यक्तिगत विकास के इच्छुक व्यक्तियों को आत्मानुशासन की कला सीखनी चाहिए, इससे आप तनाव रहित रहते है और सिर्फ करने योग्य उचित कार्य मे ही अपनी उर्जा और ध्यान केन्द्रित करते है, जिसके परिणाम स्वरुप आप सदैव दूसरों से ज्यादा गुणवत्ता पूर्ण परिणाम अपने और सभी के लिए उत्पन्न करते है I

नशीले एवं अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों से मुक्ति – यदि आप अपनी चेतना को विकसित करना चाहते है तो आपको सभी प्रकार के नशीले द्रव्य एवं जंक फ़ूड के उपभोग से स्वयं को सर्वथा मुक्त रखना होगा I

नशीले द्रव्य और जंक फ़ूड आपके मस्तिष्क और शरीर को शिथिल और मूर्छित कर देते है, वे आपके सोचने समझने की शक्ति छीन लेते है, आपके विचार और विवेक को पंगु बना देते है I उनमे ऐसे रसायनों की भरमार होती है तो आपको बेहद बीमार कर देने वाले होते हैं और वे आपको इन सभी हानिकारक तामसी पदार्थों का दास और आदी बना देते है I

चेतना विकास के इन परीक्षित और प्रमाणित सूत्रों के समुचित उपयोग से कोई भी व्यक्ति अपनी चेतना को एक बेहतर और परमार्जित तल पर ले जा सकता है और इससे प्राप्त होनेवाली शक्ति और आनंद का अनुभव कर अपना और अपने वातावरण को बेहतर और कल्याणकारी स्वरुप प्रदान कर सकता है I

यदि आप चेतना के विकास की दिशा मे कार्य कर रहे है तो आप को सभी किस्म की रुग्णता प्रदान करनेवाली बातों, व्यक्तियों और आदतों और पदार्थों से स्वयं को सदैव मुक्त रखना होगा I इसमें शाकाहार बेहद सहयोगी सिद्ध हुआ है , यह हजारों वर्षों से हमारे  साधकों द्वारा प्रमुख रूप से पालन किया जाता रहा है, चेतना के उच्च तलों पर गति करने के लिए यह परम आवश्यक है I

माँसाहारी व्यक्तियों मे उच्च स्तरीय सम्वेदनाओं का विकास एवं चेतना के ऊँचे तल पे जाने की सम्भावनाये न्यूनतम हो जाती है, क्यूंकि यह जीवन के सबसे मूलभूत मानवीय गुण करुणा की अवहेलना और अवमानना करता है, यह सिर्फ स्वाद के लिए निर्दोषों की हत्या करने की स्वीकृति पर आधारित है, जो मानवीय मूल्यों के विपरीत है I

इसे स्पष्ट रूप से संपूर्ण विश्व के सन्दर्भ मे समझा जा सकता है, करुणा, सत्य, अहिंसा और वैश्विक कल्याण और वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे सुखिन भवतु, सर्वे भद्राणि पश्यन्ति की जो अवधारणा हमारे ऋषियों, अवतारों और आत्मज्ञानीयों ने विश्व को दी है उसका कोई भी उदहारण अन्यत्र उपलब्ध नहीं है, उन्होंने मानवीय चेतना के  परम उद्दात और सूक्ष्मतम तल को उपलब्ध किया है जो किसी और विचार-जीवन पद्धति और दर्शन मे नहीं है I  

आहार बहुत ही आधारभूत रूप से हमारी चेतना के रूपांतरण मे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हमारा शरीर और मन उसी प्रकार का होता जाता है जैसा आहार और विचार का उपभोग हम करते है, इसलिए कहा गया है ” जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन” इसलिए हमारे मनीषियों ने चेतना के विकास की दिशा मे कार्यरत लोगो को इस सम्बन्ध मे बेहद सावधानी से रहने का निर्देश दिया हैI 

इस हेतु उन्होंने समस्त आहार, विहार और विचार को सात्विक, राजसिक एवं तामसिक श्रेणियों मे विभक्त किया है, तथा साथ ही यह भी इंगित किया है की कौन से पदार्थ इन विभिन्न श्रेणियों मे आते है और उनके क्या उचित और अनुचित प्रभाव हमारे शरीर और मनस के तल पर होते है I 

हमारे देश के अवतारों, ऋषियों और साधकों ने ज्ञान एवं चेतना की महत्तम ऊँचाइयों को छुआ है जो सिर्फ इस धरती पर संभव हुआ है क्यूंकि हमारे रहस्यवादी और चेतना विज्ञान के उद्गाता और प्रणेता यह जानते थे की जीवन के सभी रूपों के प्रति करुणा और प्रेम को धारण किये बगैर अस्तित्व के गहनतम रहस्यों और आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च ऊँचाइयों को प्राप्त नहीं किया जा सकता I

इस बात को आप सभी भारतीय धर्मों, संस्कृति और विश्व की अन्य सभी धर्म संस्कृतियों के मध्य अंतर को देख सकते है, अहिंसा, प्रेम, विश्वकल्याण और मानवीयता के जिन उच्चतम शिखरों को हमारे देश के मनीषियों और बुद्ध पुरुषों ने छुआ है वो अद्भुत एवं अतुलनीय है I हमारी सांकृतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियां गहरी खोज और अनुसन्धान का परिणाम है, जो अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है I

हम एक बेहद विकसित और अतुलनीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के अधिकारी और वंशज है, हमें इसकी रक्षा और पोषण करना चाहिए, न की दुष्प्रभावों और रुग्ण और अभिशप्त संस्कृतियों की विकृत और दूषित सोच और जीवन शैली को अंगीकार करके अपने सर्वनाश के मार्ग पर चलना चाहिए I

इस तरह आप देख सकते है की इन गुणों का आश्रय लेकर कोई भी व्यक्ति, अधिक से अधिक चेतनावान हो सकता है और ज्यादा गहरा, सार्थक और गुणवत्तापूर्ण जीवन जी सकता है और स्वयं के लिए और सभी के लिए अधिकतम कल्याण का सृजन कर सकता हैI

यही मनुष्य होने के नाते हमारा लक्ष्य और सर्वोपरि कर्म है, हमारा आत्यंतिक धर्मं है I इस सम्बन्ध मे आप सभी के विचार, टिप्पणियाँ और सुझाव आमंत्रित हैं I

स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे, और अपनी चेतना के विकास के सर्वमुखी सार्थक प्रयास करें, यही आनंद और मुक्ति का मंत्र है

धन्यवाद् I

आपका मित्र

अमेजिंगसुबाहू

 

 

 

 

 

 

 

 

Sharing is caring!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *