मनुष्य जीवन की सार्थकता

प्यारे मित्रों,

यह दिवस, आनंद और प्रेम से पूर्ण और परमात्मा की रौशनी से आलोकित हो,

बहुत अनोखी किंतु सच्ची बात यह है की प्रकृति ने हर जीव को जन्म के साथ ही उसे  सारी जानकारी और शक्ति के साथ यहाँ भेजा है ताकि वो अपने जीवन की सुरक्षा और पालन कर सके, लेकिन वो अपनी मूल प्रवत्तियों, भोजन, निद्रा, काम, और अपनी आत्मरक्षा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं करते और ना उनके पास इसकी समझ और जरुरत होती है, क्यूंकि उनमे, विवेक, विचार और बुद्धि नहीं होती, वो बस अपनी प्रवृत्तियों के आधीन जीवन जीते हुए मर जाते हैI

एक कुत्ता, बिल्ली, सूअर या एक गधा जन्म से लेकर मृत्यु तक वही रहते हैं, उनमे कोई भी विकास या परिवर्तन नहीं होता, बस इतना होता है की उनकी उम्र बढते जाती है और एक दिन वो मृत्यु को प्राप्त होते है I

लेकिन मनुष्यों के सम्बन्ध मे यह बात बिलकुल अलग है, मनुष्य की संतान को अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक सब कुछ जानना और सीखना पड़ता है, जीवन के हर मोड़ पर, हर नए काम के संबन्ध मे, उसे अपनी गति, प्रगति और उत्थान के लिए और खुद को पशुओं की प्रवृत्तियों से ऊपर उठने के लिए जीवन भर श्रम करना और ज्ञान अर्जित करते रहना पड़ता है I

यहाँ ऐसा नहीं है की एक बार जान लिया और बात समाप्त, यहाँ हम जिन बातों, रिश्तों, और ऊँचाइयों की ओर अग्रसर होना चाहते है हमे उनसे सम्बंधित समस्त जरुरी बातें लगातार जाननी और सीखनी पड़ती है, जो इस दिशा मे सार्थक और उचित प्रयास करता है, उसी का जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत बनता हैI

मनुष्य पशु की तरह होता है, जन्म के साथ ही, लेकिन वो अपनी, साधना, ज्ञान, विद्या और कर्म से परमात्मा बन सकता है इसी जीवन मे, और निकृष्टतम नारकीय ज़ीव भी, यह दोनों संभावनाएं सदा मौजूद है हम सभी मे I

पशुओं और मनुष्यों मे यही मूलभूत फर्क है, वरना पशु और इस धरती मे मौजूद मनुष्यों मे कोई फर्क नहीं, मेरे देखे इस धरती पे सवा सात अरब मनुष्यों की तरह दिखने वाले लोग है, लेकिन उनका सिर्फ १ प्रतिशत ही वास्तव मे मनुष्य होने की पात्रता रखते है, बाकि सब मनुष्यों का शरीर धारण किये हुए खूंखार और दुर्दांत पशु ही है, जो एक दुसरे को, नोच, मार काट और लूट रहे है, साज़िश कर रहे है, मासूमों और कमजोरो को अपनी पशुता और हैवानियत का शिकार अपनी पशु प्रवृत्तियों की तृप्ति के लिए हर पल बना रहे है I

सिर्फ मनुष्य मे यह सम्भावना है की वो राम और रावण दोनों हो सकता है, देखे हम क्या होना चाहते है, चुनाव सदा हमारा है और हम कुछ भी होने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन हर स्वतंत्रता कुछ अन्तर्निहित परिणामों के साथ ही मिलती है, हमे उसका भी ध्यान रखना चाहिए, यहाँ कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, और कीमत बहुत भारी भी हो सकती है, जो हमसे हमारा सबकुछ छीन ले सबकुछ, तो हम किस बात के लिए तैयार है, मनुष्य और देवत्व की गरिमा के शिखर छूने को या पशुता और नरक के मंज़र देखने और दिखाने को, चुनाव सदा हमारा है और जिन्दगी और परमात्मा कहते है – तथास्तु

हम मे से हर एक को देखना चाहिए हम वास्तव मे क्या है? हमने कितने मुखौटे  और खाल पहने हुए है, कितने मनुष्य और कितने पशु है हम ? क्या हमने वो जाना और सीखा है जो हमे परमात्मा की श्रेष्ट कृति होने के गौरव से भरता है, हमारे रूह के उजालों की झलक और रौशनी से हमे भरता है? 

क्या हमने अपनी पात्रता अर्जित की या हम अभी भी मनुष्य की खाल मे हिंसक भेड़ीये ही है? हमे खुद से पूछना चाहिए क्या हम ऐसे ही जीकर मरने के लिए पैदा हुये हैक्या इसलिए यह मनुष्य शरीर हमने धारण किया है, व्यर्थ का जीवन जीने और मर जाने के लिए?

क्या हमने परमात्मा की देन इस अद्भुत जीवन का कोई भी सदुपयोग किया है या इसे मूर्खतापूर्ण और विनाशकारी भोग और और अपने ही सर्वनाश मे नष्ट किया है? क्या हमने अपने जीवन मे मिले सच्चे लोगों, बातों  और शिक्षाओं का आदर और पालन किया है? क्या हम खुद से प्रेम करते है, क्या हमने खुद को वो बनाया जिसकी सामर्थ्य और शक्ति परमात्मा ने हमे दी है ?उसकी दी हुई तमाम देनों के साथ हमने क्या सलूक किया है ?

क्या हम अभी भी जागना चाहते है या नहीं, क्या हमने अपने जीवन मे आये लोगों की सलामती, बेहतरी और खुद्दारी के लिए कुछ किया है?  क्या हम अपने प्रति और अपने आश्रितों के प्रति अपने समस्त कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वाह ईमानदारी और जवाबदारी से किया है? यदि हम इनमे से कुछ भी नहीं कर रहे, तो हम क्यों जी रहे है?

इस तरह तो हमारा जीवन इतना ज्यादा दयनीय और हीन है, और हम उस परमात्मा की दी हुई हर देन के प्रति जवाबदार  है, क्या हम इसी तरह जीना और मरना चाहते है? क्या हमने खुद को अपनी ही आवारगी, दिशाहीनता और अंधेपन से मुक्त किया है? या हम इसमें इच्छुक है या नहीं?

और यदि ऐसे ही जीनाये ही हमारा लक्ष्य है तो इसमें श्रेयस बात क्या है? इसमें मनुष्यता, हमारे परिवार, माता पिता, हमारी संतान, हमारे पूर्वज, किसकी भलाई और सम्मान और श्रेष्ठता निहित है? हम क्यों इस तरह अपने ही विनाश का उपक्रम कर रहे है, और खुद को बहुत बड़ा तीसमारखां समझ रहे है?

यह आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण हर जागृत और श्रेष्ठ मनुष्य का परम कर्त्तव्य है, यह जीवन जाग कर जीने मिला है, कायरता और सत्य और स्वयं के प्रति जवाबदारी से भागते हुए जीने के लिए नहीं, यह हम सबका का सबसे जरुरी और निहायती महत्वपूर्ण काम है, बाकी सब इस की छाँव मे पलते है, जो खुद के साथ जागरूक, प्रेमपूर्ण,  इंसाफ पसंद और जवाबदार होगा वो धरती पे किसी के भी साथ बुरा और अन्यायपूर्ण न करेगा न किसी को इसकी इज़ाज़त देगा, वो कभी किसी धोखेबाज़, अत्याचारी, व्यभिचारी, और नीच लोगों की संगत नहीं करेगा, न वो कभी खुद ऐसा करेगा किसी के भी साथ,  वो अपराध, अन्याय और गुनहगारी के मार्ग पर न चलेगा न किसी को भी इसमें सहयोग करेगा न अपने परिवार मे न इसके बाहर

इस जीवन मे सब कुछ हमारी ही प्रतिध्वनि है, जो हम है, वोही देख सुन और समझ पाएंगे, परमात्मा हम सभी को श्रेष्ठता, विचारशीलता और गुणग्राहकता भरा जीवन और हृदय, मन और बुद्धि प्रदान करे, और हमारी रूह को अपने उजालों से भरे

अमेज़िंगसुबाहू

 

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